गरीब मुसलमान के नाम पर राजनीति करने वाली कई तथाकथित सेक्युलर और मुस्लिम हितैषी पार्टियाँ आज बेनकाब हो चुकी हैं

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
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इन पार्टियों ने न तो अपने सिद्धांत निभाए, न ही अपने प्रोटोकॉल का पालन किया।

मुस्लिम समाज के नौजवान बच्चों को जज़्बात में लाकर, उन्हें भड़काकर, सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया जो राजकरने नेता कभी जातिवादी पार्टी से समझौता नहीं करने की बात करते थे आज महाराष्ट्र में वही नेता जातिवादी पार्टी के साथ में मिलकर अपनी कुर्सी बचा रही है और उनके साथ समझौता करके अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं चर्चा तो ऐसी भी है कि पदाधिकारी से लेकर जिला अध्यक्ष से लेकर महाराष्ट्र अध्यक्ष तक के लोग बेनकाब होते हुए नजर आ रहे हैं क्योंकि उनकी पार्टी के पदाधिकारी उनका विरोध कर रहे हैं हमेशा से बहुत सी चर्चा ऐसी चली है कि भी टीम कहलन वाली पार्टी भी जातिवादी पार्टी की समर्थक करते हुए नजर आ रहा है चाय अकोट हो अचलपुर हो या महाराष्ट्र के अनेक एरिया हो जहां पर नगर परिषद का चुनाव होने के बाद अपने फायदे के लिए किसी भी पार्टी से समझौता करने से नहीं चुके हैं और मुसलमान के नाम पर लड़ने वाले राजकरणीय पार्टी जो सिर्फ मुस्लिम समाज को भड़काने का काम कर रही है ना तो यह किसी मुद्दे पर बात करते हैं 

न शिक्षा की बात हुई, न रोज़गार की,

न महंगाई की, न भविष्य की।

सिर्फ़ नारे दिए गए,

सिर्फ़ भाषण हुए,

और फायदा उठाया गया गरीब मुसलमान के नाम पर।

महाराष्ट्र में जिन-जिन पार्टियों ने मुसलमान और सेक्युलरिज़्म का झंडा उठाया,

वो असल में जनता की नहीं,

अपनी कुर्सी और अपने फायदे की राजनीति करती नज़र आईं।

आज सवाल यह है —

क्या मुस्लिम समाज सिर्फ़ वोट डालने के लिए है?

क्या नौजवानों की ज़िंदगी सिर्फ़ भाषणों तक सीमित है?

अब वक्त आ गया है जागने का।

जज़्बात नहीं, हिसाब माँगने का।

नारे नहीं, काम देखने का।

👉 गरीब मुसलमान को चाहिए हक़,

न कि सियासी इस्तेमाल।

— जागो मुस्लिम समाज, जागो आम जनता में ऐसी चर्चा चल रही है मलकापुर शहर में

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