हमें मालूम है सब कुछ तेरी जो भी कहानी है तुझे तो बस फरेब वह मक्कारी से दौलत कामनी है भले ही कीमती पोशाक में तू खुद को छुपा ले लेकिन तेरा लेजा बता देगा तू कितना खानदानी है

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
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नकली चेहरों का सच: आम जनता के विश्वास से खिलवाड़ कब तक

“हमें मालूम है सब कुछ, तेरी जो भी कहानी है,

तुझे तो बस फरेबों-मकर से दौलत कमानी है 

इन पंक्तियों की सच्चाई आज शहर की गलियों में गूंजती नजर आ रही है जो लोग खुद को आम जनता का हितैषी बताते थे, जो लोग बड़े

 ईमानदारी और पारदर्शिता की बातें करते थे  आज वही चेहरे सवालों के घेरे में हैं

विश्वास टूटा, सवाल खड़े हुए

शहर में चर्चा है कि कुछ तथाकथित समाजसेवी और कार्यकर्ता “दस्तावेज़ उजागर करने” के और “सच्चाई सामने लाने” के नाम पर राजकीय व्यक्तियों पर दबाव बनाते रहे। आरोप यह भी है कि बाद में चंद सिक्कों की खनक सुनते ही मुद्दे ठंडे पड़ गए और “जनहित की लड़ाई” अचानक समाप्त हो गई

आम जनता के मन में अब यह सवाल उठ रहा है 

क्या यह लड़ाई सच में जनता के लिए थी या सिर्फ निजी सौदेबाज़ी का एक जरिया?

कीमती पोशाक, सस्ता जमीर

भले ही कुछ लोग कीमती कपड़ों और बड़े-बड़े बयानों के पीछे खुद को छिपा लें, लेकिन उनका लहजा और व्यवहार उनके असली इरादों को उजागर कर देता है आज वही लोग, जो कल तक खुद को शहर का बड़े ईमानदार बता रहे थे, जनता की नजरों में कठघरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं

जनता अब जागरूक हो चुकी है

मलकापुर की जागरूक जनता अब सवाल पूछ रही है 

अगर जनहित की बात थी, तो समझौता क्यों?

अगर सच्चाई थी, तो सौदा क्यों?

अगर इरादे पाक थे, तो अपना जमीन क्यों बेचा 5..7 लाख में 

शहर के कई नागरिकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि ऐसे लोगों से सावधान रहा जाए जो “आम जनता की लड़ाई” के नाम पर निजी स्वार्थ साधते हैं

सावधान रहने की जरूरत

यह घटना एक चेतावनी है 

आम जनता और राजकीय तंत्र दोनों को अब अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है हर ऊंची आवाज सच्चाई की आवाज नहीं होती, 

नकली चेहरे भले कुछ समय के लिए तालियां बटोर लें, लेकिन सच्चाई देर-सवेर सामने आ ही जाती है ऐसी मलकापुर शहर में चर्चा चल रही है

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