असली पत्रकारिता बनाम नकली पत्रकारिता—चेहरा पत्रकार का, काम दलाली का?

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
By -
0
मलकापुर शहर में कुछ पत्रकारों की वजह से ईमानदार पत्रकार हो रहे हैं बदनाम पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती है। इसका असली मकसद सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज उठाना और व्यवस्था की कमियों को सामने लाना है। लेकिन जब पत्रकारिता को दबाव बनाने, निजी फायदे या आर्थिक लेन-देन का जरिया बनाया जाने लगे, तो सवाल उठना लाजमी है—आखिर असली पत्रकार कौन और नकली पत्रकार कौन?
आज कुछ लोग पत्रकारिता का नाम लेकर फर्जी पहचान-पत्र, संदिग्ध प्रेस कार्ड या पत्रकार होने का दिखावा करते नजर आते हैं। ऐसे लोगों के कारण ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है।
पत्रकारिता की आड़ में दबाव का खेल बंद होना चाहिए!
किसी अधिकारी, व्यापारी या आम नागरिक पर खबर के नाम पर दबाव बनाना पत्रकारिता नहीं है।
खबर छापने या रोकने के बदले किसी तरह का फायदा मांगना पत्रकारिता नहीं, बल्कि पत्रकारिता के नाम का दुरुपयोग है।
वहीं दूसरी तरफ असली पत्रकार वह है जो बिना किसी लालच के जनता के सवाल उठाए, दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर खबर करे और सत्ता चाहे किसी की भी हो—सवाल पूछने से पीछे न हटे।
 फर्जी पत्रकारों पर कार्रवाई कब?
अब जरूरत है कि संबंधित प्रशासन और जिम्मेदार संस्थाएं पत्रकारिता के नाम पर घूम रहे फर्जी पहचान-पत्र, गलत दावे और आर्थिक दबाव की शिकायतों की निष्पक्ष जांच करें। दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई हो और वास्तविक पत्रकारों की पहचान स्पष्ट हो।
क्योंकि पत्रकारिता कोई वसूली का लाइसेंस नहीं—जनता के विश्वास की जिम्मेदारी है।
शब्द की गूंज का सवाल
जो जनता की आवाज बनकर सवाल पूछता है, वह पत्रकार है…
और जो अपने फायदे के लिए पत्रकारिता का इस्तेमाल करता है, उसे पत्रकारिता के नाम पर संरक्षण क्यों?
अब वक्त आ गया है—पत्रकारिता के नाम पर चल रहे इस कथित फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हो और असली-नकली का फर्क जनता के सामने आए।

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)