आज यही पंक्तियाँ मलकापुर शहर की राजनीति पर बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही हैं। वर्षों से खुद को राजनीति का समंदर समझने वाले कुछ बड़े-बड़े राजकारणी आज हालात के आगे बेबस दिखाई दे रहे हैं।
कभी जिनके इशारे पर फैसले होते थे,
कभी जिनके दरवाजे पर भीड़ लगती थी,
आज वही चेहरे दो बूंद सियासी पानी के लिए
नौजवान और युवा नेतृत्व के सामने
हाथ जोड़कर खड़े नजर आ रहे हैं।
मलकापुर शहर में चर्चा जोरों पर है कि अब राजनीति की धारा बदल चुकी है। अनुभव का ढोल पीटने वाले नेताओं की जमीन खिसकती जा रही है, वहीं युवा नेतृत्व जनता की उम्मीद बनकर उभर रहा है।
जनता भी अब सवाल पूछ रही है —
“बरसों तक सत्ता में रहकर शहर को क्या मिला? सही तरीके का ना पीने का पानी
ना सफाई, ना विकास… तो फिर अब भरोसा क्यों?”
शहर के चौक-चौराहों, चाय की टपरियों और मोहल्लों में एक ही चर्चा है कि
अब समय वादों का नहीं, इरादों का है।
अब सत्ता विरासत में नहीं,
जनता के विश्वास से मिली है
मलकापुर की राजनीति में आज साफ दिख रहा है कि
जो खुद को समंदर समझ रहे थे,
वही आज अपनी प्यास बुझाने के लिए
युवा जोश के सामने मजबूर खड़े हैं।
अब देखना यह है कि
मलकापुर की जनता इस बदले हुए राजनीतिक मौसम में
पुराने नाम चलेंगे या नया नेतृत्व आम जनता के विश्वास पर खरा उतरेगा जो वादे नहीं इरादे लेकर आए हैं पुराने लोगों के बारे में तो एक शेर इसमें लिखा हुआ है भूखा हो तो मत पूछिए क्या खाए समंदर साहिल चबाई बस्तियां निकल जाए समंदर ऐसी मलकापुर शहर में चर्चा चल रही है

