मलकापुर शहर में इन दिनों पत्रकारिता के नाम पर एक अलग ही खेल खेले जाने की चर्चा जोरों पर है आरोप है कि कुछ तथाकथित पत्रकार, जो खुद को शहर का सबसे बड़ा प्रिंट मीडिया का चेहरा बताते हैं, अब खुलेआम दलाली पर उतर आए हैं
सूत्रों के मुताबिक, ये लोग न सिर्फ आम जनता से मोटी रकम वसूलते हैं, बल्कि जो कोई बिना दलाली के काम कराने की कोशिश करता है, उसे धमकाया भी दी जाती है। बताया जा रहा है कि अगर कोई सामाजिक कार्यकर्ता या अन्य पत्रकार सीधे अधिकारियों से संपर्क कर जनता का काम करवाता है, तो ये तथाकथित पत्रकार अधिकारियों के पास जाकर कहते हैं इनका काम मत करो क्योंकि जो लोग बिना पैसे के काम करते हैं आम जनता की सेवा करते हैं उनको रोकने की कोशिश की जा रही है कुछ दलाल पत्रकारों के जरिए
नगर परिषद में घर की नॉन कराने के नाम पर हजारों रुपए लेते हैं और अतिक्रमण की भी नॉन करवा कर दे देते हैं ऐसे भी दलाल पत्रकार की चर्चा है
7/12 (सातबारा) जैसे दस्तावेज नकली बनाने के नाम पर गरीबों से मोटी रकम वसूली करते हैं क्योंकि इनकी अधिकारियों से सेटिंग है अधिकारियों को भी आधा पैसा देते हैं और आधा खुद खा जाते हैं
जो विरोध करे या खुद से काम करे, उसे धमकियां देना और बदनाम करना कोशिश इन दलाल पत्रकार के द्वारा की जाती है
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पत्रकारिता अब सेवा नहीं, सौदेबाजी का जरिया बनती जा रही है? जिनके हाथ में कलम होनी चाहिए थी सच लिखने के लिए, वही अगर दलाली की स्याही से पन्ने रंगने लगें तो जनता किस पर भरोसा करे?
शहर में चर्चा है कि इन दलालों की “भट्टी” इसलिए जाम नहीं रही हो क्योंकि अब कुछ लोग बिना पैसे लिए, सीधे और पारदर्शी तरीके से जनता के काम कराने लगे हैं। और यही बात इन कथित पत्रकारों को रास नहीं आ रही
जनता पूछ रही है:
क्या प्रशासन इस पर ध्यान देगा?
क्या अधिकारियों पर दबाव डालने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी?
क्या पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग करने वालों पर लगाम लगेगी?
मलकापुर की जनता अब जाग चुकी है वह जानती है कि सच्ची पत्रकारिता सवाल पूछती है, सौदा नहीं करती कौन है असली और कौन है नकली यह अधिकारी लोगों ने तप करके तय करना चाहिए जिनके पेपर डी ब्लॉक होने के बाद भी निकल रहे हैं ऐसे पेरो पर और पेपर निकालने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए ऐसी भी जनता में चर्चा है

