मलकापुर शहर में इन दिनों एक नई किस्म की लीडरशिप” देखने को मिल रही है
कुछ लोग चमचमाते कपड़े पहनकर बाज़ार में ऐसे घूमते हैं मानो पूरा शहर उनके इशारों पर चलता हो लेकिन उनकी हकीकत क्या है
हकीकत यह है कि पान की टपरी वाले का सिगरेट की उधार सालों से बाकी है…
दूध वाले के पैसे अटके हैं…
किराना दुकानदार रोज़ हिसाब की कॉपी पलटता है और रास्ता देखा है कब आएंगे लीडर पैसे चुकाने
जूते चप्पल वाले की मेहनत की कमाई अटकी पड़ी है…
और अदरक लहसुन बेचने वाला आज भी उम्मीद लगाए बैठा है कि “साहब” कभी तो पैसे देंगे!
लेकिन सवाल यह है
जब उधार चुकाने की औकात नहीं, तो फिर क्यों उधर लेते हैं खुद को बड़ा लीडर बताकर क्यों घूमते हो?
क्या लीडरशिप का मतलब सिर्फ
RTI के नाम पर कागज़ डालना है
और दूसरे की शिकायत करना है
या फिर किसी राजनेता और कथित दलाल पत्रकार के साथ मिलकर चंद सिक्कों के मैं अपनी ज़मीर बेच देना यही इनके काम है
मलकापुर की जनता सब देख रही है
इलेक्शन के समय दो–दो, तीन–तीन लोगों से “सेटिंग” करने वाले…
हर खड़े होने वाले नगरसेवक सामने हाथ फैलाने वाले भिखारी अब लोगों की नजरों में आने लगे हैं
क्या ऐसे लोग खुद को सच्चा कार्यकर्ता या नेता कह सकते हैं?
नेतृत्व वो नहीं जो बाजार में रौब झाड़े…
नेतृत्व वो है जो छोटे दुकानदार का पसीना कमाई को समझें और उधर लिए हुए सामान के पैसे उन्हें चुका दे
जो उधार समय पर देते हैं उन्हें भी उनके समय पर पैसे दे देना चाहिए लीडर और कार्यकर्ता वही होता है
जो अपनी जुबान का पक्का हो…
जो जनता के लिए खड़ा हो, न कि चंद सिक्कों के लिए बिके हुआ हो
मलकापुर की सियासत में अब दिखावा नहीं, जवाबदेही चाहिए।
क्योंकि जनता पूछ रही है
“उधारी के लीडर, पहले हिसाब चुकाओ… फिर राजनीति लोगों को सिखाएं जनता में चर्चा है

