ए.आर. अंतुले: उसूलों की सियासत और साज़िशों का शिकार हुआ एक मुस्लिम मुख्यमंत्री...

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
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महाराष्ट्र की सियासत में कुछ नाम ऐसे हैं जो सिर्फ़ ओहदे से नहीं, जज़्बे, हिम्मत और अवाम से वफ़ादारी से पहचाने जाते हैं। बैरिस्टर अब्दुल रहमान अंतुले (ए.आर. अंतुले) ऐसा ही एक नाम थे जो कुर्सी पर बैठने से पहले भी अवाम के थे और कुर्सी से उतरने के बाद भी।


9 फ़रवरी 1929, रत्नागिरी की मिट्टी से उठकर मुंबई और दिल्ली की सियासत तक पहुँचना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था, यह संघर्ष, तालीम और बेबाकी का नतीजा था। लंदन से वकालत की तालीम हासिल कर सियासत में आए अंतुले साहब ने अदालत में इंसाफ़ की दलील दी और सियासत में इंसाफ़ की तलब रखी।


साल 1980 में जब बैरिस्टर ए.आर. अंतुले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, तो यह सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन नहीं था बल्कि यह सदियों से हाशिये पर रखे गए तबकों की उम्मीदों का उभरना था। एक ऐसा मुख्यमंत्री, जो किसान की भाषा समझता था, जो पुलिस वाले को इंसान मानता था और जो सत्ता को सेवा समझता था..


आज भले यह बात मामूली लगे, लेकिन उस दौर में पुलिस को हाफ पैंट से फुल पैंट देने का फ़ैसला एक क्रांतिकारी क़दम था। अंतुले साहब मानते थे कि: जो वर्दी समाज की हिफ़ाज़त करती है, उसकी इज़्ज़त भी समाज की ज़िम्मेदारी है। यह फ़ैसला सिर्फ़ कपड़ों का नहीं, बल्कि पुलिस की सामाजिक हैसियत बहाल करने का प्रतीक था।


अंतुले साहब का सबसे बड़ा काम था- किसानों की कर्ज़ माफी। उन्होंने साफ़ कहा था "जिस किसान ने पेट भरने का बोझ उठाया है, उसे कर्ज़ के बोझ तले कुचलना गुनाह है।"


उनकी नीतियों से लाखों किसानों को राहत मिली। यह वही दौर था जब सत्ता पहली बार शहर से निकलकर खेतों तक पहुँची।


लेकिन यही वह मोड़ था, जहाँ मराठा लॉबी और सत्ता के अंदर बैठे ताक़तवर गुटों को अंतुले साहब की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आई। उनके लोकप्रिय ताबड़तोड़ फैसलों से प्रशासनिक अधिकारी भी सहज थे और मराठा लॉबी परेशान।


एक ग़ैर-मराठा, एक मुसलमान और सबसे ख़तरनाक बात- एक अवाम का नेता...  इन तीनों वजहों से उनके ख़िलाफ़ साज़िशों का जाल बुना गया। आरोप लगाए गए, माहौल बनाया गया और आख़िरकार एक चुने हुए मुख्यमंत्री को मज़बूरन इस्तीफ़ा देने पर मजबूर किया गया। यह महज़ अंतुले की हार नहीं थी, यह अवाम की उम्मीदों पर वार था...


मुख्यमंत्री पद छिनने के बाद भी अंतुले साहब ख़ामोश नहीं हुए। वे कई बार लोकसभा सांसद बने, केंद्रीय मंत्री रहे और संसद में सत्ता से सवाल पूछते रहे। उनकी तक़रीरें चीख़ नहीं होती थीं, बल्कि सच की तल्ख़ आवाज़ होती थीं।


आज (9 फ़रवरी) उनके जन्मदिन की बरसी है...


एक ऐसी शख़्सियत को

जिसकी सोच में वक़ार,

क़दमों में हौसला

और अमल में ख़िदमत थी

उनकी बरसी के मौक़े पर..


हम अदब के साथ

ख़िराज-ए-तहसीन पेश करते हैं 




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