आज मलकापुर शहर में शायरी ने सच कहा, रहनुमाओं की सियासत बेनकाब”आज मलकापुर शहर में एक शायर ने अपनी शायरी के ज़रिए वो सच्चाई कह दी, जिससे रहनुमाओं की पोल खुलती है
जो बड़े-बड़े मंचों से बोलने वाले रहनुमा कहने से कतराते हैं
शायर का सवाल साफ़ है अपने आप को रहनुमा करवाने वाले लोगों ने आवाम के हर मुद्दों का ध्यान देना चाहिए
काम के हालात कैसे सुधरेंगे?
नौजवानों का भविष्य किस दिशा में जाएगा?
लेकिन अफ़सोस…
शहर के कुछ तथाकथित नेता और रहनुमा
नौजवानों काम को शिक्षा और रोज़गार की बात करने के बजाय
जन्मदिन, दिखावे और भीड़ जुटाने की राजनीति में उलझा रहे हैं।
इस्लामी परंपरा की बात करें तो—
क़ुरआन और हदीस में जन्मदिन मनाने की कोई अनिवार्यता नहीं मिलती।
इसके बावजूद कुछ लोग खुद को “रहनुमा” बताकर
हर साल केक, पोस्टर, बैनर और सोशल मीडिया की चमक में डूबे रहते हैं।
सवाल ये नहीं कि कोई निजी तौर पर क्या करता है—
सवाल ये है कि क्या यही रहनुमाई है?
क्या यही वो रास्ता है
जिससे बेरोज़गार नौजवानों का भविष्य बनेगा?
क्या यही वो नेतृत्व है
जो समाज को सही दिशा देगा?
आज शायर ने आईना दिखाया है—
और आईने में दिखने वाली सूरत
कुछ लोगों को चुभ रही है।
आम जनता को अब तय करना होगा—
काम की बात करने वालों के साथ खड़े रहना है
या दिखावे और खोखले जश्न की राजनीति से दूरी बनानी है।
क्योंकि
रहनुमा वही होता है
जो भीड़ नहीं,
रास्ता दिखाए।

