जन्मदिन मनाने का काम यहूदी का है लेकिन यहां जन्मदिन के नाम पर पूरी काम को गुमराह किया जा रहा है आज हम एक ऐसे सामाजिक मुद्दे की बात कर रहे हैं, जो धीरे-धीरे हमारी आने वाली नस्लों को गलत दिशा की ओर ले जा रहा है
इस्लाम मज़हब में, न कुरआन में और न ही हदीसों में कहीं यह लिखा है कि जन्मदिन मनाना कोई धार्मिक फ़र्ज़ या ज़रूरी अमल ह इसके बावजूद आज हमारे समाज में कुछ राजकीय और प्रभावशाली लोग अपने निजी फ़ायदे, प्रचार और दिखावे के लिए बड़े-बड़े जन्मदिन समारोह आयोजित कर रहे हैं
और यही लोग खुद को समाज का रहनुमा भी कहते हैं
चिंता की बात यह है कि जब रहनुमा केक काटते हैं,जश्न मनाते हैं, तो उसी को देखकर हमारे नौजवान और बच्चे भी उसी राह पर चल पड़ते हैं
आज जन्मदिन के नाम पर कई युवा होटल में दारू पीते नज़र आते हैं, नाच-गाना होता है, फिज़ूलखर्ची होती है और फिर कहा जाता है कि यह सब नॉर्मल” है
सवाल यह है
क्या यही रहनुमाई है
क्या यही हमारी तालीम और तरबियत का मक़सद है
अगर कोई सच में रहनुमा है, तो उसे अपनी आने वाली नस्ल के लिए मिसाल पेश करनी चाहिए
केक काटने के बजाय ग़लत सोच को काटना चाहिए
दिखावे के बजाय समाज की बुराइयों के ख़िलाफ़ खड़ा होना चाहिए
शराब और फिज़ूलखर्ची के बजाय बच्चों की एजुकेशन, तालीम और अख़लाक़ पर ध्यान देना चाहिए
आज ज़रूरत है इस बात की कि जन्मदिन को जश्न नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी निभाई जाए
ज़रूरतमंद बच्चों की मदद हो,
किताबें बाँटी जाएँ,
तालीमी दी जाए,
और समाज में अच्छाई फैलाने का काम किया जाए
आने वाली नस्ल वही सीखेगी, जो आज के रहनुमा उसे दिखाएँगे
अगर रहनुमा सही रास्ता दिखाएँगे, तो समाज भी सही दिशा में चलेगा
और अगर नहीं, तो नुकसान सिर्फ़ एक व्यक्ति का नहीं, पूरी कौम का होगा
यह सवाल आज हर समझदार इंसान को खुद से पूछना चाहिए
क्या हम केक काटने वाले रहनुमा चाहते हैं या फिर सही रहा बताने वाला चाहते हैं
ऐसी मलकापुर शहर में चर्चा चल रही है

