आज भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक असाधारण और अभूतपूर्व क्षण दर्ज होने जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ख़ुद सुप्रीम कोर्ट में खड़ी होकर SIR (Special Intensive Revision

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
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पर दाख़िल याचिका पर दलीलें देंगी। यह सिर्फ़ एक कानूनी बहस नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर सीधा आरोप है जिसने एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को मजबूर कर दिया कि वह शासन छोड़कर अदालत में अपनी ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करे।

यह सवाल बेहद गंभीर है—आख़िर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ पैदा कर दी गईं कि एक मुख्यमंत्री को वकील की भूमिका निभानी पड़ रही है? जवाब साफ़ है: चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और केंद्र सरकार की भूमिका पर उठते गहरे संदेह। SIR को तकनीकी प्रक्रिया बताकर लागू किया जा रहा है, लेकिन इसके ज़रिए मतदाता सूची से नाम हटाने, चुनिंदा वर्गों को निशाना बनाने और चुनावी संतुलन को प्रभावित करने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं।


चुनाव आयोग, जो कभी निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा का प्रतीक माना जाता था, आज उसकी भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हैं। क्या आयोग अब स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है या सत्ता के इशारों पर काम करने वाला एक औज़ार? विपक्षी राज्यों में सक्रियता, लेकिन केंद्र शासित या भाजपा शासित राज्यों में चुप्पी—यह दोहरा रवैया लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक संकेत है।


मोदी सरकार के दौर में संस्थाओं की स्वायत्तता लगातार कमजोर होती दिख रही है—चाहे वह ईडी हो, सीबीआई हो, राज्यपाल हों या अब चुनाव आयोग। असहमति को दबाने, विपक्षी सरकारों को घेरने और संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक हथियार बनाने का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा।


ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद दलील देना एक चेतावनी है—अगर लोकतंत्र को संस्थाएँ नहीं बचाएंगी, तो चुने हुए जनप्रतिनिधियों को ही आगे आना पड़ेगा। यह सिर्फ़ बंगाल का मामला नहीं, यह पूरे देश के मतदाता के अधिकार और लोकतांत्रिक भविष्य का सवाल है। आज की बहस सिर्फ़ SIR पर नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की आत्मा पर है।

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