बुरा मत मानो होली है लेकिन सियासत का रंग कौन सा है?.

शैख़ जमील मुख्य संपादक शब्द की गूंज
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 मलकापुर शहर में कुछ सफेद कपड़े पहनने वाले लीडर कार्यकर्ता है जो हर किसी को ब्लैकमैन करने का धंधा बना लिए है लेकिन वह बेशर्मों की इतनी बेइज्जती हो रही है कि वह हर चौखट पर जाकर मार खा रहे हैं फिर भी उन्हें शर्म नहीं आ रही है वह बेशर्म कुत्ते के जैसे हर किसी की चौखट पर जाकर हर किसी को ब्लैकमेल करने की सोचते हैं लेकिन अब वह हर चौखट पर जलील हो रहे हैं 

होली के रंगों के बीच आज मलकापुर शहर के सियासत मे एक अलग ही रंग देखने को मिल रहा है

शहर में चर्चा गर्म है कि कुछ  कार्यकर्ता हर राजनैतिक चौखट पर दस्तक दे रहे हैं

मुद्दा जनता का बताते हैं… लेकिन  सिर्फ अपना फायदा सोचते हैं 

कभी किसी नेता के खिलाफ आवाज उठाने का दावा…

तो कभी उसी नेता के दरवाज़े पर  अपना जमीर बेच देते हैं समझौते की नाम पर जैसे ही उन्हें हड्डी मिल जाती है वह फिर दूसरे राजकरणी की चौखट पर चले जाते हैं ऐसे कुत्तों से भी सावधान रहने की जरूरत है मलकापुर शहर की 

जनता पूछ रही है 

क्या यह संघर्ष है?

या फिर सौदेबाज़ी की सियासत मे 

सूत्रों की मानें तो कुछ लोग पहले हंगामा करते हैं, फिर पर्दे के पीछे समझौते की खबरें सामने आती हैं

और उसके बाद वही लोग खुद को “जनता का सिपाही” बताते नजर आते हैं

जनता की प्रतिक्रिया:

स्थानीय नागरिकों का कहना है 

“अगर लड़ाई जनता के लिए है, तो सौदेबाज़ी क्यों?

अगर इरादे साफ हैं, तो बार-बार समझौते क्यों?

लेकिन सियासत में रंग बदलते रहें,

तो जनता कब तक भरोसा करेगी?

फिलहाल मलकापुर की गलियों में यही सवाल गूंज रहा है 

 या बेशर्म को मार खाने के बाद भी शर्म नहीं आ रही है ऐसी भी चर्चा तेजी से चल रही है

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