जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिशों पर उठ रहे गंभीर सवाल
मलकापुर : शहर में जब कोई पत्रकार आम जनता की समस्याओं को अपनी कलम और कैमरे के माध्यम से सामने लाता है, भ्रष्टाचार पर सवाल उठाता है और जनता के अधिकारों की आवाज बनता है, तब उसकी जिम्मेदारी सिर्फ खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह व्यवस्था से जवाब मांगने का काम भी करता है।
लेकिन सवाल यह है कि जब पत्रकार व्यवस्था से सवाल पूछता है, तो कुछ राजनीतिक और कथित प्रभावशाली लोग असहज क्यों हो जाते हैं?
जनता के बीच चर्चा है कि जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों को कभी दबाव, कभी राजनीतिक प्रभाव और कभी कानूनी कार्रवाई के डर से चुप कराने की कोशिश की जाती है। यदि किसी खबर में तथ्यात्मक गलती है तो उसका जवाब तथ्यों और दस्तावेजों के साथ दिया जाना चाहिए, न कि पत्रकार की आवाज दबाने का प्रयास किया जाना चाहिए
पत्रकार सवाल पूछता है, फैसला नहीं सुनाता
अगर किसी नेता, अधिकारी या संस्था पर सवाल उठते हैं तो उसका जवाब देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। आखिर जनता के टैक्स से चलने वाली व्यवस्था में जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक मतभेदों को पत्रकारिता की स्वतंत्रता से अलग रखा जाए। पत्रकार किसी पार्टी का विरोधी या समर्थक नहीं, बल्कि जनता के सवालों का माध्यम होना चाहिए
कलम को डराकर खबरें बंद नहीं की जा सकतीं।
जिस मुद्दे पर जनता परेशान है, उस मुद्दे पर सवाल उठेंगे। जिस काम में पारदर्शिता की जरूरत है, वहां जवाब मांगा जाएगा। और जहां भ्रष्टाचार के आरोप हैं, वहां जांच और दस्तावेजों के आधार पर सच्चाई सामने आनी चाहिए
सवाल सीधा है क्या जनहित में सवाल पूछना अब गुनाह हो गया है?
अगर पत्रकार को सवाल पूछने पर दबाया जाएगा, तो कल आम जनता अपनी आवाज किसके माध्यम से उठाएगी?
सच्ची पत्रकारिता किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं होती वह व्यवस्था को आईना दिखाती है। और आईना दिखाने वाले को तोड़ने के बजाय, आईने में दिखाई दे रही तस्वीर को सुधारने की जरूरत है

